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योजना आयोग को खत्म करें या इसे ज्यादा सक्रिय और व्यावहारिक बनाएं
15 July,2014
हवा में ज्यादा और जमीन पर कम रही हैं योजना भवन के वातानुकूलित चैंबरों में बनाई गई योजनाएं
जब से, 1950 में एक कैबिनेट प्रस्ताव के जरिये सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए सरकार के संसाधनों का कारगर तरीके से आकलन, समन्वय और आवंटन के लिए योजना आयोग का गठन किया गया, इस गैर संवैधानिक निकाय की आलोचना अक्सर आरामतलब सलाहकारों एवं हवा हवाई विषेशज्ञों के एक समूह के रूप में होती रही है जो जमीनी हकीकत की नब्ज को पकड़ पाने में विफल रहे हैं। हालांकि योजना आयोग के पास कोई भी संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं रहा है, लेकिन 109 वरिश्ठ अधिकारियों तथा 800 से अधिक स्टाफ की संख्या वाले 30 डिवीजनों से सुसज्जित योजना आयोग अपनी षुरूआत से ही राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार के विभागों के प्लान फंडों का वितरण और निगरानी करता आ रहा है। यह पैनल परियोजनाओं को मंजूरी मिलने, उन्हें समय पर फंड मिलने तथा मंत्रालयों, सेक्टरों के साथ समन्वय करने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता रहा है। बहरहाल, राज्य सरकारें, खासकर उन क्षेत्रीय दलों द्वारा षासित राज्य सरकारंे, जो केंद्र की राजनीतिक पार्टी के विरोध में हैं, षायद ही कभी केंद्र सरकार द्वारा आवंटित फंड से संतुश्ट रहती हैं जो उन्हें योजना संगठन द्वारा अनुषंसित की जाती है। वह योजना आयोग के द्वारा , जो संसद के प्रति जबावदेह तक नहीं है। जहां कई नीति निर्माताओं और अर्थषास्त्रियों ने प्लान पैनल में नए सिरे से फेरबदल करने का सुझाव दिया है, पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के पुरोधाओं ने योजना आयोग की भूमिका में भी बदलाव की वकालत की है। इसके अतिरिक्त, हाल की मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि नई सरकार योजना आयोग को केवल लालफीताषाही को बढ़ावा देने वाले तथा पुराने लाइसेस राज के एक जीव के रूप में देखती है जिसका आज के उदार आर्थिक परिदृष्य में कोई सार्थक उपयोग नहीं है। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद अपने विदाई भाशण में एक लगातार खुली होती अर्थव्यवस्था में योजना आयोग की भूमिका की समीक्षा करने की अपील की। भारत के पूर्व वित मंत्री पी चिदंबरम ने भी योजना आयोग के आकार को कम करने का समर्थन किया और कहा कि योजना आयोग को काफी सीमित संगठन होना चाहिए जिसका काम संभावित योजनाओं का खाका खींचना होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि फिलहाल यह बहुत बड़ा, चर्बीयुक्त और अनुपयोगी संगठन है। वर्तमान में योजना आयोग को भंग किए जाने की चर्चा जोरों पर चल रही है क्योंकि कई लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की सरकार में ऐसे योजनाकर्ताओं की षायद ही कोई जगह है जिनका समाज के निचले तबके से कोई संपर्क या संबंध नहीं है। अब फोकस ज्यादा वास्तविक कार्य संपादन तथा परिणामोन्मुखी क्रियान्वयन पर है। योजना आयोग को भंग किए जाने से देष के हवा हवाई विषेशज्ञों के समुदाय को भारी झटका लग सकता है, हालांकि ऐसा जल्द होने के आसार कम हैं। बहरहाल, भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,जोकि आयोग के नए चेयरमैन हैं, योजना आयोग के कामकाज की समीक्षा करेंगे तथा इसका पुनर्गठन करना चाहेंगे। भाजपा के चुनाव घोशणापत्र में भी योजना आयोग के पुनर्गठन के बारे में चर्चा की गई थी क्योंकि इसे देष के समाजवादी अतीत की एक धरोहर के रूप में देखा जाता है। इसमें कहा गया था कि केंद्र को राज्य सरकारों के लिए केवल एक सक्षमकारी तथा सुविधा मुहैया कराने वाला होना चाहिए। 1950 में अपनी षुरूआत के बाद से पहली बार इस वर्श योजना आयोग भारतीय रेलवे के लिए सकल बजटीय समर्थन को अंतिम रूप देने में नीति निमार्ण प्रक्रिया में षामिल नहीं था। इसके अतिरिक्त, वित मंत्रालय को राज्य एवं केंद्रीय स्तर के मंत्रालयों को आवंटन देने के हाल के फैसले से यह प्रदर्षित होता है कि योजना आयोग अब अपने मौजूदा स्वरूप में काम नहीं करेगा। यह तथ्य कि योजना भवन को इसके वित्तीय अधिकारों से वंचित कर दिया गया है, उस महत्वपूर्ण भूमिका के खात्मे का संकेत देता है जो योजना आयोग अबतक निभा रहा था। यह अबतक के उस सबसे बड़े बदलाव के प्रारंभ का भी संकेत देता है जो कई दषकों बाद भारतीय वित्तीय क्षेत्र में दिख रहा है। हाल में, योजना राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार राव इंदरजीत सिंह ने यह संकेत देते हुए कि उनकी सरकार योजना आयोग के लिए नए उपाध्यक्ष की नियुक्ति करने को लेकर अभी तक फैसला नहीं कर पाई है, बदलाव की प्रकृति को स्पश्ट कर दिया। मई 2014 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष के प्रमुख पद पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया काबिज रहे थे। उन्होंने तथा आयोग के पूर्व सदस्यों ने 27 मई को इस्तीफा दे दिया, अपने आफिस खाली कर दिए तथा योजना भवन से बाहर निकल आए। उनमें से ज्यादातर को, जो सदस्य के रूप में थे, आयोग में प्रिंसीपल सलाहकार के बतौर तैनात सचिव स्तर के अधिकारियों को ट्ांसफर कर दिया गया है। इस प्रकार, वर्तमान में योजना आयोग से संबंधित सारा कुछ अनिष्चिय की स्थिति में है। प्रधानमंत्री अभी तक यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि वह एक उपाध्यक्ष की नियुक्ति करना चाहते हैं या नहीं? अभी तक, यह हमेषा ही एक कैबिनेट स्तर का पद होता रहा है। उपरोक्त घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए यह सलाह दी जा सकती है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार को योजना आयोग के भविश्य का फैसला करने के दौरान निम्न तीन विकल्पों पर विचार करना चाहिए ़1 योजना आयोग का पुनर्गठन या इसकी भूमिका में बदलाव 2 इसे प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिशद के साथ विलय कर दें या 3 अब योजना आयोग को पूरी तरह भंग ही कर दिया जाए। अब मुझे इनमें से प्रत्येक विकल्प की व्याख्या करने दीजिए.. 1 योजना आयोग का पुनर्गठन या इसकी भूमिका में बदलाव .. अगर केंद्र सरकार मानती है कि आयोग के राज्यों एवं योजनाओं को फंड आवंटित करने के इसके परंपरागत अधिकार या इसकी भूमिका में बदलाव किया जाए, तो सरकार को पहले योजना आयोग में निहित व्यापक अधिकारों को वापस ले लेना चाहिए। च्ूंकि राव इंदरजीत सिंह को नई सरकार में योजना राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है, उनके पास पहले के मंत्रियों की तुलना में ज्यादा अधिकार हैं। इस स्थिति में योजना आयोग को योजना राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार का एक हिस्सा दिया जाना चाहिए और योजना राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार और आयोग के बीच के मौजूदा दुहराव को खत्म कर दिया जाना चाहिए। जैसे ही यह हो जाएगा, बजटीय और प्लान आवंटन की योजना आयोग की पारंपरिक भूमिका पूरी तरह खत्म हो जा सकती है। योजना आयोग को परियोजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करने का दायित्व दिया जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य एवं केंद्र सरकारों द्वारा मंजूर परियोजनाओं की प्रगति की जांच की जा सकती है तथा इस पर भी निगरानी रखी जा सकती है कि आवंटित राषि में से कितनी रकम खर्च की गई है। यह प्रत्येक परियोजना को लेकर बढ़ी हुई लागत के मद्वेनजर जरूरी कदमों की भी समीक्षा कर सकता है। सरकार पंचवर्शीय योजनाओं को भी खत्म कर सकती है और उसकी जगह त्वरित निर्णय और तेज क्रियान्वयन के लिए सालाना योजनाएं षुरू कर सकती है जिसकी निगरानी योजना राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार के तहत कार्य करने वाला योजना आयोग कर सकता है। 1 अप्रेैल, 2012 से षुरू 12वीं पंचवर्शीय योजना ने अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं की है इसलिए पंचवर्शीय योजनाओं को खत्म करने से कोई समस्या नहीं होगी। यह कदम मोदी जी के मंत्र के अनुरूप भी है जिसमें कहा गया है कि भारत को क्रियान्वयन चाहिए न कि केवल योजना और विजन। इसके अतिरिक्त, मोदी जी हमेषा केंद्रीयकृत योजनाओं और पुराने ढर्रे पर चलते रहने के रवैये की भी सार्वजनिक रूप से आलोचना करते रहे हंै। 2. योजना आयोग का प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिशद के साथ विलय … 2012 में डा. सी रंगराजन की अध्यक्षता में गठित एक कमिटी ने योजना और गैर योजना आवंटनों के बीच के अंतर को खत्म करने की अनुषंसा की थी। आगामी आम बजट जिसे वित मंत्री अरूण जेटली 10 जुलाई, 2014 को पेष करेंगे, के पहली बार अनुषंसा को क्रियान्वित करने की उम्मीद है। ज्ब अंतरिम बजट ने पहले ही अधिकांष केंद्र प्रायोजित योजनाओं को राज्य सरकारों को हस्तांतरित कर दिया है, इस बार योजना आयोग की राज्यों को फंडों के आवंटन में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभानी है। और प्रत्येक राज्य सरकार ने इसे बिल्कुल स्पश्ट कर दिया है कि वे चाहते हैं कि नई व्यवस्था जारी रहे और इसे और विस्तारित किया जाए। उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में जहां योजना आयोग की पारंपरिक भूमिका खत्म कर दी गई है, इसका महत्व कम हो रहा है। इसके अतिरिक्त, चूंकि मोदी केंद्रीयकृत योजनाओं के खिलाफ हैं, वह नहीं चाहते कि राज्यों के लिए दिल्ली से चली नीतियों, योजनाओं या संसाधन आवंटनों की कोई भूमिका हो, बल्कि राज्यों के लिए उनके अपने विषिश्ट उपाय हों। इसी प्रकार, केंद्र सरकार प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिशद, पीएमइएसी के साथ विलय करने पर विचार कर सकती है जिसकी स्थापना प्रमुख आर्थिक मुद्वों पर विभिन्न विचारों पर सरकार में जागरूकता भरने के लिए की गई थी। पीएमइएसी का विभिन्न संगठनात्मक संरचनाओं के साथ मान्यता प्राप्त अंतरराश्ट्ीय ख्याति के विभिन्न अर्थषास्त्रियों की अध्यक्षता में बार बार पुनर्गठन किया गया है। योजना आयोग पीएमइएसी के लिए प्रषासनिक, लाॅजिस्टिक, प्लानिंग एवं बजटिंग उद्वेष्यों के लिए नोडल एजेंसी रहा है। चूंकि इन दोनों संगठनों के काम काफी करीबी रहे हैं और कुछ खास क्षेत्रों में ओवरलैप करते भी दिखते हैं, उनके एकीकरण से निष्चित रूप से संसाधन आवंटन का अधिकतम उपयोग संभव हो सकेगा। 3… आयोग को समाप्त करना़़ ….. हाल के दिनों में फेडेरलिज्म के लिए बढ़ती वकालत और बेहतर होते केंद्र व राज्य संबंधों के कारण जहां राज्यों का संबंध है तो योजना आयोग को बीच से पूरी तरह हटा दिया गया है। वित्त मंत्रालय ने राज्यों से उनकी मांगों को सुनने तथा फंडों के वितरण के लिए उनसे सीधा संवाद बनाना षुरू कर दिया है। योजना आयोग को सकल बजटीय समर्थन के आकार को तय करने की चर्चाओं से भी हटा दिया गया है क्योंकि कई राज्य सरकारों एवं केंद्रीय मंत्रालयों का मानना है कि उनकी स्थिति उस हालत में ज्यादा अच्छी होती है जब योजना आयोग उनके सरों पर न बैठा हो। इससे पहले, आम तौर पर आंकड़े तभी सामने आ पाते थे जब योजना आयोग तथा वित्त मंत्रालय के बीच चर्चा होती थी और प्रधानमंत्री अंतिम फैसला करते थे। यह दावा करते हुए कि योजना आयोग मुख्य रूप से सोवियत युग का एक ढांचा है जोकि आज की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी उपयोगिता खो चुकी है, कुछ लोगों का कहना है कि योजना भवन के वातानुकूलित चैंबरों में बनाई गई योजनाएं हवा में ज्यादा और जमीन पर कम हैं। उनका तर्क है कि इस प्रकार, यह योजना आयोग एक निर्रथक आयोग बन कर रह गया है और यह देष अब ऐसे विलासितापूर्ण अयोग्य आयोगों का बोझ और नहीं उठा सकता। उपरोक्त मुद्वों को देखते हुए कुछ तबकों से इस अनुपयोगी संस्था को पूरी तरह खत्म कर देने की पुरजोर मांगें उठनी लगी हैं। उदाहरण के लिए, अर्थषास्त्री अरविंद पानगरिया जो अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इकोनोमिक्स के प्रोफेसर भी हैं, कहते हैं कि योजना आयोग को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसकी और अधिक व्याख्या करते हुए पानगरिया कहते हैं कि भारत में योजना बनाना एक आदत बन गई है और इस आदत को खत्म करने की जरूरत है। वह कहते हैं कि हम एक बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में रह रहे हैं। इसकी योजना बनाई जानी चाहिए, लेकिन योजना आयोग द्वारा नहीं बल्कि मंत्रालयों द्वारा। वह जोर देकर कहते हैं कि ऐसे संस्थानों के मुद्वों पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है।
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